गुच्छी मशरूम की खेती से आत्मनिर्भरता की नई कहानी गढ़ते नवीन पटवाल

गुच्छी मशरूम की खेती से आत्मनिर्भरता की नई कहानी गढ़ते नवीन पटवाल

गुच्छी मशरूम, जो प्राकृतिक रूप से हिमालयी क्षेत्रों में सीमित मात्रा में पाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत महंगा बिकता है। इसकी मांग देश-विदेश के होटल उद्योग और औषधीय उपयोगों में लगातार बनी रहती है। किंतु इसकी नियंत्रित और वैज्ञानिक खेती एक बड़ी चुनौती मानी जाती रही है।

उत्तराखंड के पौड़ी जनपद के फलदाकोट गांव से निकली एक पहल आज आत्मनिर्भर भारत के सपने को नई ऊर्जा दे रही है। यह कहानी है नवीन पटवाल की। एक ऐसे युवा उद्यमी की, जिन्होंने विश्व के सबसे महंगे मशरूमों में गिने जाने वाले गुच्छी मशरूम का सफल व्यावसायिक उत्पादन कर एक नई दिशा दिखाई है।

संघर्ष से शुरुआत, संकल्प से सफलता

लगभग 18 वर्षों से मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में सक्रिय नवीन पटवाल ने अपनी यात्रा पारंपरिक खेती से शुरू की। शुरुआती दौर में उन्होंने बटन, ऑयस्टर और अन्य प्रजातियों पर काम किया। समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि यदि पहाड़ के किसानों को वास्तविक आर्थिक मजबूती देनी है, तो उन्हें उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ना होगा।

गुच्छी मशरूम, जो प्राकृतिक रूप से हिमालयी क्षेत्रों में सीमित मात्रा में पाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत महंगा बिकता है। इसकी मांग देश-विदेश के होटल उद्योग और औषधीय उपयोगों में लगातार बनी रहती है। किंतु इसकी नियंत्रित और वैज्ञानिक खेती एक बड़ी चुनौती मानी जाती रही है।

दो बार असफलता, पर हौसला कायम

नवीन ने रुड़की (हरिद्वार) में एक हाईटेक प्लांट स्थापित किया, जहां तापमान, आर्द्रता और प्रकाश को नियंत्रित करने वाली आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। पहले दो प्रयास असफल रहे। उत्पादन अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ। आर्थिक दबाव भी बढ़ा, लेकिन नवीन ने इसे हार नहीं, बल्कि सीख के रूप में लिया।

उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से परामर्श किया, शोध पत्रों का अध्ययन किया और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रयोग किए। मिट्टी की संरचना, स्पॉन की गुणवत्ता, नमी का स्तर और वेंटिलेशन, हर पहलू पर गहन परीक्षण किया गया।

वैज्ञानिक पद्धति से मिली सफलता

तीसरे प्रयास में मेहनत रंग लाई। गांव में स्थापित नेट हाउस और पॉलीहाउस में पूरी तरह नियंत्रित वातावरण तैयार किया गया। लगभग 100 वर्ग मीटर के पॉलीहाउस से 80 किलो ताजा गुच्छी मशरूम का उत्पादन हुआ, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

गुच्छी मशरूम की बाजार कीमत गुणवत्ता और आकार के अनुसार 25 हजार से 40 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंचती है। मात्र 90 दिनों में तैयार होने वाली यह फसल किसानों के लिए उच्च लाभ देने वाला विकल्प बन सकती है।

पहाड़ में रोजगार का नया मॉडल

नवीन पटवाल का मानना है कि यदि पहाड़ के युवाओं को स्थानीय स्तर पर आय के अवसर मिलें, तो पलायन की समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। गुच्छी मशरूम की खेती कम भूमि में अधिक आय देने वाली है और इसे आधुनिक तकनीक के सहारे नियंत्रित वातावरण में किया जा सकता है।

उनकी इकाई में स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार दिया जा रहा है। इससे न केवल आय के साधन बढ़ रहे हैं, बल्कि गांव में आर्थिक गतिविधियां भी तेज हो रही हैं।

प्रशिक्षण और विस्तार की योजना

नवीन अब इस मॉडल को बड़े स्तर पर फैलाने की तैयारी में हैं। वे इच्छुक किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना चाहते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग इस उच्च मूल्य वाली खेती से जुड़ सकें।

उनका मानना है कि यदि सरकार और प्रशासन तकनीकी मार्गदर्शन, सब्सिडी और विपणन सहायता प्रदान करें, तो यह मॉडल पूरे उत्तराखंड में लागू किया जा सकता है। इससे राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलेगी।

रिवर्स माइग्रेशन की ओर कदम

उत्तराखंड लंबे समय से पलायन की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में नवीन पटवाल की पहल केवल एक व्यावसायिक सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संकेत है।

यह कहानी बताती है कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच और दृढ़ संकल्प के साथ पहाड़ों में भी असीम संभावनाएं हैं। यदि युवा जोखिम उठाने को तैयार हों और सही मार्गदर्शन मिले, तो गांव ही विकास का केंद्र बन सकता है।

नवीन पटवाल की यह यात्रा हमें सिखाती है, सपने बड़े हों, प्रयास निरंतर हो और सोच वैज्ञानिक हो, तो असंभव भी संभव हो सकता है।

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