पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान का कार्यकाल छह माह के लिए बढ़ाया गया

पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान का कार्यकाल छह माह के लिए बढ़ाया गया

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान को छह माह का कार्यकाल विस्तार दिया गया है। यह निर्णय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (से.नि.) गुरमीत सिंह द्वारा लिया गया है।

डॉ. मनमोहन सिंह चौहान का वर्तमान तीन वर्ष का कार्यकाल 28 अगस्त 2025 को समाप्त हो रहा था। अब वे 29 अगस्त 2025 से आगामी छह माह तक अथवा नए कुलपति की नियुक्ति तक विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर बने रहेंगे।

नए कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया जारी

विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, नए कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया फिलहाल प्रगति पर है, परंतु इसमें अभी कुछ और समय लग सकता है। ऐसे में प्रशासनिक कार्यों की निरंतरता बनाए रखने और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व अनुसंधान गतिविधियों में व्यवधान से बचने के लिए यह अंतरिम निर्णय लिया गया है।

विद्वत परिषद की बैठक में मिली स्वीकृति

विश्वविद्यालय के निदेशक (संचार) डॉ. जे.पी. जायसवाल ने बताया कि यह सूचना मंगलवार को आयोजित 403वीं विद्वत परिषद की बैठक के दौरान दी गई। इस अवसर पर परिषद में उपस्थित सभी सदस्यों ने इस निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त की और डॉ. चौहान को उनकी निरंतर सेवाओं एवं नेतृत्व के लिए बधाई दी।

डॉ. चौहान का है उल्लेखनीय योगदान

डॉ. मनमोहन सिंह चौहान के कार्यकाल में विश्वविद्यालय ने शोध, नवाचार, कृषि तकनीक के प्रचार और कृषक-हितैषी योजनाओं के क्रियान्वयन में उल्लेखनीय प्रगति की है। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर पर कई मान्यताएं मिलीं और राज्य के कृषि क्षेत्र में भी सुधार देखने को मिला है।

निरंतरता से होगा संस्थान को लाभ

शिक्षा जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि कार्यकाल में यह विस्तार न केवल प्रशासनिक स्थायित्व को बनाए रखेगा, बल्कि विश्वविद्यालय की चल रही शैक्षणिक और अनुसंधान परियोजनाओं को भी गति देगा। विशेष रूप से विश्वविद्यालय द्वारा आगामी महीनों में आयोजित होने वाले कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की सफलता में यह निरंतरता सहायक सिद्ध होगी।

पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान को कार्यकाल विस्तार मिलने से विश्वविद्यालय में निरंतरता, स्थायित्व और प्रबंधन को बल मिलेगा। यह निर्णय एक ओर जहां संस्था के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर राज्य के उच्च शिक्षा और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में भी स्थायित्व का प्रतीक है।

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