उत्तराखंड में मूल निवास भू कानून की मांग फिर तेज हो गई है। फर्जी स्थायी निवासी प्रमाणपत्रों और भूमि के व्यावसायिक दोहन को लेकर मूल निवास भू कानून संघर्ष समिति ने देहरादून के गांधी पार्क में धरना दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पहाड़ों की कृषि योग्य जमीन तेजी से बाहरियों के कब्जे में जा रही है, जो राज्य के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।
देहरादून का गांधी पार्क एक बार फिर लोगों की आवाज़ों से गूंज उठा। ठंडी सुबह में खुले आसमान के नीचे बैठी भीड़ सिर्फ एक मांग कर रही थी—मूल निवास भू कानून। संघर्ष समिति का यह शांत लेकिन दृढ़ विरोध अब एक बड़े जनसमर्थन का रूप ले चुका है।
उत्तराखंड में लंबे समय से यह चिंता जताई जा रही है कि फर्जी स्थायी निवास प्रमाणपत्रों के आधार पर बाहरी लोग जमीन खरीद रहे हैं, और धीरे-धीरे पहाड़ों की कृषि योग्य भूमि व्यावसायिक भूखंडों में बदलती जा रही है। संघर्ष समिति के संयोजक ललून टोडरिया बताते हैं कि राज्य की पहचान, संस्कृति और भूमि सुरक्षा के लिए यह कानून अब अनिवार्य हो चुका है। धरने में शामिल लोगों के लिए यह सिर्फ एक कानूनी मांग नहीं, बल्कि पहाड़ों के भविष्य की लड़ाई है। उनका कहना है कि सरकार ने मूल निवास पर अपनी नीति कभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखी। इसी अस्पष्टता का फायदा उठाकर हजारों लोग फर्जी निवासी प्रमाणपत्र बनवा रहे हैं, जिससे वास्तविक उत्तराखंडी युवाओं के हक छिन रहे हैं।

समिति के सदस्यों ने कहा कि भाजपा सरकार को पहाड़ों और मैदानों के बीच मौजूद संवेदनशीलता को समझना होगा। अगर कृषि योग्य भूमि पर बेतहाशा निर्माण जारी रहा तो आने वाले समय में न तो जमीन बचेगी और न पहाड़ी जीवन की मूल पहचान। धरने में महिलाओं, युवाओं और सामाजिक संगठनों की भारी भागीदारी देखने को मिली। महिला मंच की निर्मला बिष्ट ने कहा कि पहाड़ों की महिलाएँ सदियों से जमीन और जंगलों की संरक्षक रही हैं। “अगर भूमि पर नियंत्रण हमारे हाथ से गया, तो पीढ़ियों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा,” उन्होंने भावुक होकर कहा।
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के त्रिभुवन चौहान ने इसे राज्य की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न बताया। वहीं युवा कलाकार कनिष्क जोशी ने युवाओं के सामने रोजगार और जमीन दोनों के छिनने का खतरा जताया। संघर्ष समिति का कहना है कि मूल निवास भू कानून के जरिए ही यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि उत्तराखंड की भूमि, संस्कृति और संसाधन सुरक्षित रहें। हिमांशु रावत ने कहा कि यह आंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि पहाड़ों की पुकार है “अपनी भूमि बचाओ, अपना भविष्य बचाओ।”

धरना देते लोगों में यह विश्वास साफ दिखा कि सरकार उनकी आवाज़ सुनेगी और मूल निवास भू कानून को लागू करने पर ठोस निर्णय लेगी। अब पूरा राज्य देख रहा है कि अगला कदम सरकार कब और कैसे उठाती है।पहाड़ों की इस लड़ाई में आवाज़ें अभी थमी नहीं हैं। गांधी पार्क से उठी ये पुकार अब गांव-गांव पहुँच रही है। सवाल सिर्फ इतना है क्या सरकार समय रहते इस आवाज़ को सुनेगी… या पहाड़ों की ज़मीन पर संकट और गहराता जाएगा?








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