विनोद घिल्डियाल का जीवन भी आम पहाड़ी युवाओं जैसा ही था। सीमित साधन, रोजगार के कम अवसर और भविष्य को लेकर असमंजस। लेकिन उन्होंने हालात से समझौता करने के बजाय, हालात को ही बदलने का फैसला किया। शहर की ओर पलायन करने की जगह उन्होंने गांव में रहकर ही स्वरोजगार की राह चुनने का साहसिक कदम उठाया।
उत्तराखंड के पहाड़ी गांव अक्सर संघर्ष, सीमित संसाधनों और पलायन की कहानियों से जुड़े रहे हैं। लेकिन टिहरी गढ़वाल जनपद के कीर्तिनगर ब्लॉक अंतर्गत अमरोली गांव (मालूपानी) के निवासी विनोद घिल्डियाल ने इस धारणा को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर सोच सकारात्मक हो और मेहनत सच्ची, तो गांव में रहकर भी न सिर्फ आत्मनिर्भर बना जा सकता है, बल्कि दूसरों के लिए भी रोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं।
सीमित संसाधन, लेकिन मजबूत इरादे
विनोद घिल्डियाल का जीवन भी आम पहाड़ी युवाओं जैसा ही था। सीमित साधन, रोजगार के कम अवसर और भविष्य को लेकर असमंजस। लेकिन उन्होंने हालात से समझौता करने के बजाय, हालात को ही बदलने का फैसला किया। शहर की ओर पलायन करने की जगह उन्होंने गांव में रहकर ही स्वरोजगार की राह चुनने का साहसिक कदम उठाया।
हरे चारे से आत्मनिर्भरता की शुरुआत
उनकी यात्रा की शुरुआत पशुपालन से जुड़े एक छोटे लेकिन बेहद उपयोगी विचार से हुई, पशुओं के लिए हरा चारा उगाना। गांव में पशुपालन आम है, लेकिन हरे चारे की नियमित उपलब्धता एक बड़ी समस्या रहती है। विनोद जी ने इस जरूरत को अवसर में बदला। उन्होंने हरे चारे की खेती शुरू की, जिससे न केवल उनकी अपनी आमदनी बढ़ी, बल्कि आसपास के पशुपालकों को भी बड़ा सहारा मिला।
यह पहल धीरे-धीरे सफल होने लगी और इसी सफलता ने उनके भीतर आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की ऊर्जा भर दी।
पर्यावरण के साथ रोजगार का अनोखा संगम
हरे चारे की सफलता के बाद विनोद घिल्डियाल ने कुछ नया और अलग करने की ठानी। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान को आधार बनाते हुए मालू के पत्तों से दोने और पत्तल बनाने का कार्य शुरू किया।
यह काम पूरी तरह प्राकृतिक है, ना मशीनों की जरूरत, ना रासायनिक सामग्री की। मालू के पत्तों से बने दोने-पत्तल स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होते हैं और सदियों से पहाड़ की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।
आज जब प्लास्टिक और थर्माकोल से बने उत्पाद पर्यावरण के लिए खतरा बन चुके हैं, ऐसे में विनोद जी के प्राकृतिक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ने लगी। शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजनों, मेलों और होटलों तक उनके बनाए दोने-पत्तल पहुंचने लगे।
घर से शुरू हुआ काम, बना स्थायी रोजगार
जो काम कभी घर के एक कोने से शुरू हुआ था, वही आज स्थायी रोजगार का रूप ले चुका है। विनोद घिल्डियाल इस पहल से न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बने, बल्कि उन्होंने गांव के 8 से 10 ग्रामीणों को भी रोजगार से जोड़ा है।
इससे गांव में ही आय के साधन बने हैं और सबसे अहम बात, पलायन पर रोक लगी है। स्थानीय युवाओं को अब रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर जाने की मजबूरी नहीं रही।
आत्मनिर्भर भारत की सोच, गांव स्तर पर साकार
विनोद घिल्डियाल का यह प्रयास सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सोच को जमीनी स्तर पर साकार करता है। उनका काम दिखाता है कि आत्मनिर्भरता केवल बड़े उद्योगों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे स्थानीय प्रयासों से भी हासिल की जा सकती है।
एक मिसाल, जो राह दिखाती है
विनोद जी की कहानी यह साफ संदेश देती है कि सफलता शहरों की मोहताज नहीं होती। अगर लगन सच्ची हो, सोच नवाचार से भरी हो और मेहनत से डर न हो, तो गांव में रहकर भी सपनों को पूरा किया जा सकता है।
आज विनोद घिल्डियाल न केवल अपने गांव के लिए प्रेरणा हैं, बल्कि उन तमाम युवाओं के लिए भी उम्मीद की किरण हैं, जो हालात से हार मानने की सोच रहे हैं।









