उत्तराखंड के सरकारी शिक्षक केवल शिक्षक नहीं रहा। वह चुनाव कर्मी है, जनगणना अधिकारी है, स्वास्थ्य कार्यकर्ता है, पोषण मिशन का सुपरवाइज़र है और डिजिटल डेटा एंट्री ऑपरेटर भी है। सप्ताह का शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब वह पूरी निष्ठा से केवल पढ़ाने का काम कर पाए। विडंबना यह है कि जब बच्चों का सीखने का स्तर गिरता है या नामांकन घटता है, तो सबसे पहले सवाल उसी शिक्षक पर उठते हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ी गांव में स्थित वह सरकारी विद्यालय कभी पूरे क्षेत्र की शान हुआ करता था। सुबह की प्रार्थना में बच्चों की आवाज़ गूंजती थी, कक्षाओं में चॉक की खड़खड़ाहट सुनाई देती थी और शिक्षक बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटे रहते थे। लेकिन समय के साथ इस विद्यालय का स्वरूप बदलता चला गया। आज वही विद्यालय शिक्षा का केंद्र कम और सरकारी योजनाओं का कार्यालय अधिक प्रतीत होता है।
विद्यालय के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही शिक्षा का वातावरण नहीं, बल्कि प्रशासनिक गतिविधियों की झलक मिलती है। दीवारों पर शैक्षिक चार्ट से अधिक सरकारी अभियानों के पोस्टर हैं। स्वच्छता अभियान, पोषण अभियान, डिजिटल साक्षरता, बाल गणना, टीकाकरण, चुनाव जागरूकता और न जाने कितनी योजनाएं। हर कमरे में रजिस्टरों के ढेर लगे हैं और हर शिक्षक किसी न किसी पोर्टल में डेटा भरने में व्यस्त है।
कक्षा में बच्चों की संख्या अब उंगलियों पर गिनी जा सकती है। कभी जिस कक्षा में चालीस बच्चे बैठते थे, आज वहां दस भी मुश्किल से मिलते हैं। शिक्षक पढ़ाने के लिए कक्षा में पहुंचता है, लेकिन तभी किसी कार्यालय से फोन आ जाता है। “आज सर्वे की अंतिम तिथि है”, “पोर्टल अपडेट नहीं हुआ”, “फॉर्म अभी तक जमा नहीं हुए।” किताबें खुली रह जाती हैं और शिक्षक फिर से कागज़ों की दुनिया में लौट जाता है।
आज का सरकारी शिक्षक केवल शिक्षक नहीं रहा। वह चुनाव कर्मी है, जनगणना अधिकारी है, स्वास्थ्य कार्यकर्ता है, पोषण मिशन का सुपरवाइज़र है और डिजिटल डेटा एंट्री ऑपरेटर भी है। सप्ताह का शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब वह पूरी निष्ठा से केवल पढ़ाने का काम कर पाए। विडंबना यह है कि जब बच्चों का सीखने का स्तर गिरता है या नामांकन घटता है, तो सबसे पहले सवाल उसी शिक्षक पर उठते हैं।
सरकारी तंत्र की सोच अक्सर योजनाओं तक सीमित रह गई है। हर समस्या का समाधान एक नई योजना, एक नया ऐप या एक नई सुविधा में खोजा जाता है। मुफ्त किताबें, वर्दी, बैग, जूते, टैबलेट, सब कुछ दिया जा रहा है, लेकिन जो सबसे जरूरी है, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। कक्षा में शिक्षक की नियमित उपस्थिति और बच्चों के साथ उसका समय। शिक्षा कोई वितरण प्रणाली नहीं, बल्कि एक सतत मानवीय प्रक्रिया है।
इस स्थिति का प्रभाव अभिभावकों पर भी पड़ा है। वे सरकारी विद्यालयों से भरोसा खोते जा रहे हैं। चाहे बड़ी मुश्किल से फीस भरनी पड़े, लेकिन निजी विद्यालय उन्हें अधिक विश्वसनीय लगते हैं, क्योंकि वहां शिक्षक कक्षा में होता है, पढ़ाई नियमित होती है और स्कूल का मुख्य उद्देश्य केवल शिक्षा होता है, न कि योजनाओं का क्रियान्वयन।
यदि यही स्थिति बनी रही, तो सरकारी विद्यालय केवल भवन और फाइलों तक सिमट जाएंगे। कक्षाएं खाली होंगी, स्कूल विलय होंगे और शिक्षा का अधिकार कागजों में सिमट कर रह जाएगा। जरूरत इस बात की है कि विद्यालयों को योजनाओं के बोझ से मुक्त किया जाए, शिक्षकों को उनका मूल कार्य करने दिया जाए और स्कूल को फिर से ज्ञान, संवाद और सीखने का केंद्र बनाया जाए।
अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब गांव का वह विद्यालय, जहां कभी बच्चों की हंसी गूंजती थी, पूरी तरह एक सरकारी कार्यालय में बदल जाएगा। जहां फाइलें तो होंगी, लेकिन भविष्य गढ़ने वाले बच्चे नहीं।








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