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उत्तराखंड में मूल निवास भू कानून की मांग फिर तेज हो गई है। फर्जी स्थायी निवासी प्रमाणपत्रों और भूमि के व्यावसायिक दोहन को लेकर मूल निवास भू कानून संघर्ष समिति ने देहरादून के गांधी पार्क में धरना दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पहाड़ों की कृषि योग्य जमीन तेजी से बाहरियों के कब्जे में जा रही है, जो राज्य के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है।
READ MOREपिथौरागढ़ में 2020 में लिए गए पतंजलि गाय घी के नमूने जांच में फेल पाए गए हैं। राज्य और राष्ट्रीय लैब दोनों में घी मानकों पर खरा नहीं उतरा। 1348 दिन चली प्रक्रिया के बाद न्याय निर्णायक अधिकारी ने पतंजलि आयुर्वेद समेत डिस्ट्रीब्यूटर और दुकानदार पर कुल 1.40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। विभाग ने लोगों को उत्पाद सावधानी से खरीदने की सलाह दी है।
READ MOREउत्तराखंड में शिक्षक भर्ती को लेकर एक संवेदनशील मामला सामने आया है। दूसरे राज्यों से आई बहुओं ने पति की जाति आधारित आरक्षण श्रेणी पर आवेदन किया, लेकिन जांच में सामने आया कि शादी मात्र से आरक्षण का अधिकार नहीं मिलता। कई जिलों में ऐसी महिला अभ्यर्थियों के दस्तावेज़ों की पड़ताल की गई और शासन ने साफ़ किया कि ऐसे मामलों में आरक्षण लागू नहीं होगा।
READ MOREइस अक्टूबर, नंदाकिनी घाटी में हुई तबाही को भूविज्ञान विशेषज्ञ प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट ने बेहद नज़दीक से देखा। दशकों से पहाड़ों को पढ़ने-समझने वाले बिष्ट बताते हैं कि यह आपदा प्रकृति के क्रोध से नहीं, बल्कि हमारी अनियंत्रित बसावट, लालच और वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी का नतीजा है। घाटी बार-बार संकेत देती है, क्या हम सुनेंगे?
READ MOREउत्तराखंड अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। दो दशक से अधिक बीतने के बाद भी बेरोज़गारी, पेपर लीक और पलायन जैसी समस्याएँ जस की तस हैं। जहाँ एक ओर विकास की चमक दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर पहाड़ों की वास्तविकता अब भी अंधेरे में है।
READ MOREतेजी से सोने की बढ़ती कीमतों के बीच, उत्तराखंड के एक गांव की पंचायत ने एक अनोखा फैसला लिया है, अब शादी या पारिवारिक आयोजनों में महिलाएं सिर्फ तीन गहने ही पहन सकेंगी, जिनमें नथ, कान की बाली और मंगलसूत्र शामिल हैं। पंचायत का मानना है कि यह कदम दिखावे की होड़ और आर्थिक बोझ को कम करने में मदद करेगा।
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दिल्ली-एनसीआर में बसे प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए अपनी मातृभाषा और लोकसंस्कृति को जीवित रखने का एक अनूठा अभियान पिछले 15 वर्षों से लगातार चल रहा है। उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के तत्वावधान में गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं की ग्रीष्मकालीन शिक्षण कक्षाएं हर वर्ष आयोजित की जाती हैं। वर्ष 2012 से शुरू हुई यह पहल आज एक विशाल सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
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उत्तराखंड को कभी जल स्रोतों की धरती कहा जाता था। यहां के पहाड़ों से निकलने वाले प्राकृतिक नौले, धारे, गदेरे और झरने गांवों की जीवनरेखा थे। लेकिन आज वही जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। राज्य के कई गांवों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गर्मियों के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है और खेती-बाड़ी भी प्रभावित हो रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।
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