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हिमालय की ऊंचाइयों पर जब बर्फ पिघलती है, तो सिर्फ ग्लेशियर ही नहीं बदलते, हमारी सच्चाई भी सामने आती है। उन दुर्गम पहाड़ों पर, जहां शुद्धता और शांति का वास माना जाता है, वहीं इंसान ने अपने पीछे कचरे के ढेर छोड़ दिए हैं। प्लास्टिक की बोतलें, रैपर, टूटी चप्पलें और इस्तेमाल किए गए टेंट, यह सब किसी आपदा के बाद नहीं, बल्कि हमारे ‘घूमने’ के बाद बचा हुआ सच है।
READ MORE30 साल पैरा SF में सेवा के बाद कमांडो हीरा सिंह पटवाल अल्मोड़ा के अपने गांव लौटे। बंजर ज़मीन को खेती में बदला, पशुपालन शुरू किया और आत्मनिर्भरता की मिसाल बने। वे युवाओं को गांव लौटने, खेती अपनाने और पहाड़ बचाने का संदेश दे रहे हैं।
READ MOREटिहरी जिले के स्यांड़ी गांव की महिलाओं ने पहाड़ के शुद्ध पानी को रोजगार का साधन बना लिया है। ‘देवभूमि शुद्ध धारा’ नाम से मिनरल वाटर प्लांट शुरू कर 11 महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं। यह पहल स्थानीय रोजगार और जल संरक्षण का सशक्त उदाहरण है।
READ MOREदेहरादून में सड़क खुदाई को लेकर प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। अब रात में खुदाई करने पर सुबह तक सड़क भरकर चलने लायक बनाना अनिवार्य होगा। 10 विभागों के 85 कार्यों को सशर्त अनुमति दी गई है। नियम तोड़ने पर एफआईआर तक की कार्रवाई हो सकती है।
READ MOREदून अस्पताल और सेफड़ू द्वारा किए गए शोध में सामने आया है कि आंखों के ऑपरेशन के दौरान शेरॉन चीरा तकनीक अपनाने से चश्मे का नंबर बढ़ने की संभावना कम हो जाती है। 100 मरीजों पर किए गए अध्ययन में यह तकनीक सबसे प्रभावी साबित हुई।
READ MOREउत्तराखंड में कीवी की खेती से बंजर खेतों की सेहत सुधरेगी और किसानों की आय बढ़ेगी। सरकार नई कीवी नीति के तहत 70 प्रतिशत सब्सिडी दे रही है। लक्ष्य है कि 2030 तक 3500 हेक्टेयर क्षेत्र में कीवी के बागान विकसित किए जाएं।
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दिल्ली-एनसीआर में बसे प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए अपनी मातृभाषा और लोकसंस्कृति को जीवित रखने का एक अनूठा अभियान पिछले 15 वर्षों से लगातार चल रहा है। उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के तत्वावधान में गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं की ग्रीष्मकालीन शिक्षण कक्षाएं हर वर्ष आयोजित की जाती हैं। वर्ष 2012 से शुरू हुई यह पहल आज एक विशाल सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
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उत्तराखंड को कभी जल स्रोतों की धरती कहा जाता था। यहां के पहाड़ों से निकलने वाले प्राकृतिक नौले, धारे, गदेरे और झरने गांवों की जीवनरेखा थे। लेकिन आज वही जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। राज्य के कई गांवों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गर्मियों के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। महिलाओं को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है और खेती-बाड़ी भी प्रभावित हो रही है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।
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