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उत्तराखंड में कीवी की खेती से बंजर खेतों की सेहत सुधरेगी और किसानों की आय बढ़ेगी। सरकार नई कीवी नीति के तहत 70 प्रतिशत सब्सिडी दे रही है। लक्ष्य है कि 2030 तक 3500 हेक्टेयर क्षेत्र में कीवी के बागान विकसित किए जाएं।
READ MOREउत्तराखंड में वेलनेस टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए रिज़ॉर्ट की तर्ज पर नेचुरोपैथी अस्पताल खोले जाएंगे। इन अस्पतालों में बिना दवाइयों के प्राकृतिक तरीकों से इलाज होगा। पहले चरण में चंपावत, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों में अस्पताल खोलने की तैयारी है।
READ MOREउत्तराखंड के पहले खेल विश्वविद्यालय के लिए केंद्र सरकार ने भूमि की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। हल्द्वानी वन प्रभाग की 12.317 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर विश्वविद्यालय बनेगा। राज्य सरकार 2026 से कक्षाएं शुरू करने की तैयारी में है, जिससे प्रदेश के खिलाड़ियों को बड़ा मंच मिलेगा।
READ MOREउत्तराखंड के एक दूरस्थ गांव में सड़क निर्माण की स्वीकृति के बावजूद आज तक सड़क नहीं बन पाई। नतीजा यह है कि बीमार मरीजों को पांच किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। यह घटना पहाड़ी इलाकों में विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है।
READ MOREउत्तराखंड सरकार ने पीआरडी जवानों के लिए बड़ा फैसला लिया है। अब सामान्य ड्यूटी में मृत्यु पर मुआवज़ा 50 हजार से बढ़ाकर 1 लाख किया गया है, जबकि अत्यंत संवेदनशील ड्यूटी में मृत्यु होने पर 75 हजार की जगह 1.50 लाख रुपए दिए जाएंगे। CM धामी ने स्थापना दिवस समारोह में इसकी घोषणा की।
READ MOREरामनगर के कोसी और दाबका नदी क्षेत्र में भूकंप से बड़ा भू-परिवर्तन संभव है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी बड़े भूकंप की स्थिति में दाबका नदी का बहाव बदलकर कोसी से मिल सकता है। आईआईटी कानपुर और वैज्ञानिकों की नई स्टडी में फॉल्ट लाइन पर बड़े निर्माण को गंभीर खतरा बताया गया है।
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महाविद्यालय के विकसित भारत संकल्प क्लब द्वारा बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर तीन विशेष कार्यक्रमों का सफल आयोजन किया गया। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य विद्यार्थियों में रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना, भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा देना तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना था। पूरे महाविद्यालय परिसर में सकारात्मक, उत्साहपूर्ण एवं अनुशासित वातावरण देखने को मिला।
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हिमालय की ऊंचाइयों पर जब बर्फ पिघलती है, तो सिर्फ ग्लेशियर ही नहीं बदलते, हमारी सच्चाई भी सामने आती है। उन दुर्गम पहाड़ों पर, जहां शुद्धता और शांति का वास माना जाता है, वहीं इंसान ने अपने पीछे कचरे के ढेर छोड़ दिए हैं। प्लास्टिक की बोतलें, रैपर, टूटी चप्पलें और इस्तेमाल किए गए टेंट, यह सब किसी आपदा के बाद नहीं, बल्कि हमारे ‘घूमने’ के बाद बचा हुआ सच है।
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