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दिवाकर भट्ट सिर्फ एक नेता नहीं थे, वे उत्तराखंड आंदोलन की धड़कन थे। 1994 से लेकर राज्य बनने तक हर मोर्चे पर उनका चेहरा जिद, साहस और जनता की बेबसी के बीच खड़ा दिखा। भीड़, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, गोली का आदेश सबका सामना करते हुए उन्होंने पहाड़ की आवाज़ दिल्ली तक पहुंचाई। UKD के माध्यम से उन्होंने पहाड़ की राजनीति को नई पहचान दी। उनका जाना पहाड़ की अस्मिता का सबसे बड़ा नुकसान है।
READ MOREउत्तराखंड में शिक्षक भर्ती को लेकर एक संवेदनशील मामला सामने आया है। दूसरे राज्यों से आई बहुओं ने पति की जाति आधारित आरक्षण श्रेणी पर आवेदन किया, लेकिन जांच में सामने आया कि शादी मात्र से आरक्षण का अधिकार नहीं मिलता। कई जिलों में ऐसी महिला अभ्यर्थियों के दस्तावेज़ों की पड़ताल की गई और शासन ने साफ़ किया कि ऐसे मामलों में आरक्षण लागू नहीं होगा।
READ MOREइस अक्टूबर, नंदाकिनी घाटी में हुई तबाही को भूविज्ञान विशेषज्ञ प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट ने बेहद नज़दीक से देखा। दशकों से पहाड़ों को पढ़ने-समझने वाले बिष्ट बताते हैं कि यह आपदा प्रकृति के क्रोध से नहीं, बल्कि हमारी अनियंत्रित बसावट, लालच और वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी का नतीजा है। घाटी बार-बार संकेत देती है, क्या हम सुनेंगे?
READ MOREउत्तराखंड में वोटर लिस्ट सुधार अभियान शुरू होने जा रहा है। दूसरे राज्यों में शादी कर गईं और अब वापस अपने मायके आई बेटियों को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या सुधार कराने के लिए जरूरी कागज़ देने होंगे। चुनाव आयोग की यह नई पहल पारदर्शिता और शुद्ध मतदाता सूची तैयार करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है।
READ MOREबद्रीनाथ धाम में नवनिर्मित भव्य प्रवेश द्वार का लोकार्पण गरिमामय माहौल में हुआ। गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर, लैंसडौन द्वारा भेंटस्वरूप बनाए गए इस द्वार ने मंदिर परिसर की आस्था, सौंदर्य और परंपरा में नई चमक जोड़ दी है। उद्घाटन समारोह में सेना और प्रशासन की संयुक्त उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी विशेष बना दिया।
READ MOREदेहरादून जनपद की चकराता ब्लॉक निवासी नीलम चौहान ने पर्यटन विभाग की पंडित दीनदयाल उपाध्याय होमस्टे योजना से स्वरोजगार की नई राह बनाई। 15 लाख की सहायता से शुरू किया गया उनका “हरुल-ए-बुटीक होमस्टे” आज आत्मनिर्भरता की मिसाल है। सालाना 25-30 लाख की आय के साथ नीलम सात लोगों को रोजगार देकर बनीं प्रेरणा स्रोत।
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उत्तराखंड के सितारगंज से निकलकर हिमांशु गुप्ता ने यह सिद्ध कर दिया कि हालात नहीं, बल्कि हौसले सफलता तय करते हैं। पिता की सड़क किनारे चाय की दुकान और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बिना किसी कोचिंग के, केवल सेल्फ-स्टडी के बल पर उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और तीन बार परीक्षा पास की।
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नरेंद्र सिंह नेगी केवल लोकगायक नहीं, उत्तराखंड की आत्मा की आवाज़ हैं। उनके गीत पहाड़ के संघर्ष, पलायन, पर्यावरण और सामाजिक सच्चाइयों को ईमानदारी से सामने रखते हैं। बिना शोर और दिखावे के, उनकी गायकी हर पीढ़ी को जोड़ती है और लोक को वर्तमान में जीवित रखती है।
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