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सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र द्वारा संस्था के संस्थापक तथा रंगमंच जगत के सुप्रसिद्ध संगीतकार स्व. मोहन उप्रेती के 98वें जन्मदिवस पर संस्था की 58 वर्षों की उपलब्धियों पर आधारित स्मारिका का लोकार्पण तथा उनके द्वारा गीत-नाट्यों और नाटकों का प्रभावशाली एवं मनमोहक मंचन किया गया।
READ MOREकालू सिंह माहरा का जीवन त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। उन्होंने सिद्ध किया कि सीमित साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के विरुद्ध डटकर लड़ा जा सकता है।
READ MOREऐपण बचपन से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों और पारिवारिक आयोजनों में घर की महिलाओं को पारंपरिक लाल गेरू और चावल के घोल से सुंदर आकृतियां बनाते देख उन्होंने इस कला को सीखा। समय के साथ उन्होंने इसे केवल पारंपरिक आंगन और चौकी तक सीमित न रखकर कैनवास, लकड़ी की प्लेट, दीवार सज्जा, उपहार सामग्री और कॉर्पोरेट गिफ्ट आइटम्स तक विस्तार दिया।
READ MOREगुच्छी मशरूम, जो प्राकृतिक रूप से हिमालयी क्षेत्रों में सीमित मात्रा में पाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत महंगा बिकता है। इसकी मांग देश-विदेश के होटल उद्योग और औषधीय उपयोगों में लगातार बनी रहती है। किंतु इसकी नियंत्रित और वैज्ञानिक खेती एक बड़ी चुनौती मानी जाती रही है।
READ MOREउत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के युगपुरुष, स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की 99वीं जयंती की पूर्व संध्या पर उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा डीपीएमआई सभागार, न्यू अशोक नगर, दिल्ली में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नेगी जी के गीतों, संस्मरणों और उनके सांस्कृतिक अवदान को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया।
READ MOREउत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से पलायन वर्षों से एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बना हुआ है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस प्रवृत्ति को उलटकर नई राह बना रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले के छोटे से गांव गौरीकोट की रहने वाली सविता रावत ऐसी ही एक सशक्त महिला हैं, जिन्होंने ‘रिवर्स पलायन’ को केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सफल और टिकाऊ मॉडल बनाकर दिखाया है।
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विद्यार्थियों के पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी मध्याह्न भोजन (मिड डे मील) योजना में कथित अनियमितताओं और वित्तीय गड़बड़ियों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। राज्य के कई जिलों और विकासखंडों के विद्यालयों में खाद्यान्न वितरण, उपभोग और अभिलेखों में संभावित विसंगतियों की पड़ताल की जाएगी।
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उत्तराखंड को लंबे समय से देश की “वीरभूमि” और “सैनिक प्रदेश” के रूप में जाना जाता है। राज्य के लगभग प्रत्येक पाँचवें परिवार का कोई न कोई सदस्य सेना, अर्धसैनिक बलों या पूर्व सैनिक समुदाय से जुड़ा हुआ है। ऐसे प्रदेश में सैनिकों के सम्मान से जुड़ी किसी भी पहल का महत्व केवल प्रशासनिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक भी होता है। यही कारण है कि देहरादून में निर्मित “सैन्य धाम” परियोजना आरम्भ से ही चर्चा और विवाद दोनों का विषय बनी हुई है।
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